कोरोना मरीजों को नहीं मिल रहा ऑक्सीजन, नोएडा में प्रशासन का दावा फेल!

कोरोना मरीजों को नहीं मिल रहा ऑक्सीजन, नोएडा में प्रशासन का दावा फेल!

नोएडा: कोरोना संक्रमण के गंभीर मरीजों के इलाज के चाहे कितने भी दावे गौतमबुद्धनगर जिला व स्वास्थ्य विभाग कर लें, लेकिन हकीकत कुछ और बयां कर रही है। संक्रमण से लड़ने के लिए सबसे महत्वपूर्ण ऑक्सीजन (प्राणवायु) की जिले में उपलब्धता नहीं है। जबकि दावा किया जा रहा है कि 60 मैट्रिक टन ऑक्सीजन की जिले में आवश्यकता है, 50 मैट्रिक टन की आपूर्ति हो रही है।

जिलाधिकारी ने गोयल गैस प्रबंधन को लिखित पत्र में स्पष्ट किया है कि जिले में उन्हें केवल 22 फीसद ऑक्सीजन आपूर्ति मिल रही है, जबकि कंपनी प्रबंधन की ओर से गाजियाबाद को 47, दिल्ली को 25 और गौतमबुद्धनगर समेत अन्य जनपदों को पांच फीसद में ही समेट दिया जा रहा है। 22 फीसद ऑक्सीजन के सहारे सौ फीसद शहरवासियों का जीवन कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है। यहीं कारण है कि जिले में कोरोना संक्रमण से अधिक मौत हो रही हैं। अस्पताल से ज्यादा होम आइसोलेशन में मरीजों का इलाज चल रहा है। गिरते ऑक्सीजन सेचुरेशन को संभालने के लिए मरीजों की के स्वजन ऑक्सीजन का सिलेंडर लेकर जिले से लेकर गाजियाबाद, दिल्ली की दौड़ लगा रहे है। गौतमबुद्धनगर में 4 एजेंसी जय दुर्गा गैसेज, पूजा गैसेज, मित्तल एयर प्रोडक्ट एवं संजीवनी गैसेज की ओर से अस्पतालों को ऑक्सीजन आपूर्ति के लिए अधिकृत किया गया है। फिर भी संपूर्ण आपूर्ति पर संकट बना हुआ है। जबकि यह लोग गौतमबुद्धनगर के साथ-साथ गाजियाबाद में भी आपूर्ति कर रहे है।

अधिक बेड के बावजूद नहीं मिल रही ऑक्सीजन
गोयल गैस प्रबंधन की ओर से उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपद गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मेरठ, राजधानी दिल्ली को लगभग 4500 डी टाइप ऑक्सीजन सिलेंडर की आपूर्ति की जा रही है। इसमें गौतमबुद्धनगर को का अंश मात्र 22.03 फीसद, जबकि गाजियाबाद का अंश 47.12 फीसद निर्धारित है। गाजियाबाद में कोविड बेड की संख्या लगभग 3200 है और गौतमबुद्धनगर में 3714 कोविड बेड की संख्या है, जिसे निरंतर बढ़ाया जा रहा है।

जिले की कंपनियों की ओर से ऑक्सीजन की आपूर्ति
एजेंसी प्राप्त सिलेंडर गौतमबुद्धनगर में आपूर्ति अंतर

संजीवनी गैस 333 141 192

जय दुर्गा गेसेज 310 205 105

पूजा गैस कंपनी 160 160 -

ईएसआइ 72 72 -

कुल 875 578 297

गाजियाबाद की कंपनी कर रही ऑक्सीजन की आपूर्ति
एजेंसी प्राप्त सिलेंडर गौतमबुद्धनगर में आपूर्ति अंतर

अभि गैसेज- 1051 158 893

अग्रवाल गैसेज 753 35 718

छह अस्पतालों को सीधे ऑक्सीजन आपूर्ति का आदेश

गौतमबुद्धनगर में जहां कोविड व नान कोविड मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है, वहीं लगभग 900 डी टाइप ऑक्सीजन सिलेंडर की आपूर्ति गोयल गैस से कम हो रही है। इसलिए कंपनी को सीधे निर्देश दिया गया है कि वह छह अस्पतालों को अतिरिक्त डी टाइप ऑक्सीजन सिलेंडर की आपूर्ति सीधी करें।

इन अस्पताल में सिलेंडर की आपूर्ति की जाए
नोएडा कोविड अस्पताल सेक्टर-39 200

चाइल्ड पीजीआइ, सेक्टर-30100

शर्मा मेडिकेयर- 60

सूर्या हास्पिटल- 40

जेएस हास्पिटल- 40

निम्स- 85

इंडो गोल्फ- 40

संजीवनी- 60

एसआरएस हास्पिटल- 50


गेहूं का ऐसा बीज जिसे खाद की जरूरत नहीं, उत्पादन में भी 15 से 35 फीसद तक की बढ़ोतरी

गेहूं का ऐसा बीज जिसे खाद की जरूरत नहीं, उत्पादन में भी 15 से 35 फीसद तक की बढ़ोतरी

 किसानों की आय को दोगुना करने के पीएम मोदी के संकल्प को पूरा करने में इंजीनियर अक्षय श्रीवास्तव का शोध मील का पत्थर साबित होगा। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से बीटेक करने वाले इंजीनियर अक्षय गेहूं का ऐसा बीज तैयार कर रहे हैं, जिसे खाद की जरूरत नहीं होगी। इस नैनो कोटेड बीज को पहले तीन महीने पानी देना होगा न ही

सल्फर, पोटाश जैसे माइक्रो न्यूट्रेंटस। उत्पादन में 15 से 35 फीसद की बढ़ोतरी करने वाला यह गेहूं पूरी तरह जैविक और पौष्टिक होगा। खाद-पानी का खर्च कम होने पर उत्पादन की लागत घटेगी, जिससे किसानों की आय स्वत: बढ़ जाएगी।

भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने लैब परीक्षण का परिणाम देखने के बाद शोध को पूरा करने के लिए 10 लाख रुपये तक का अनुदान दिया है। कानपुर आइआइटी के प्रोफेसर अमिताभ बंद्योपाध्याय के निर्देशन में नैनोटेक्नोलाजी, बायोटेक्नोलॉजी और केमिकल इंजीनियङ्क्षरग से तैयार हो रहे बीज का काम अंतिम चरण में है। कुशीनगर के रहने वाले इंजीनियर अक्षय के मुताबिक पहले चरण में जीवाणुओं को अलग करने, बीज के अनुसार उनकी ग्रुपिंग, जमीन में परीक्षण और उस मिट्टी के परीक्षण का काम पूरा हो चुका है। ये जीवाणु न केवल मिट्टी में जाकर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, जिंक, सल्फर, कार्बन जैसे नौ तत्व बनाते मिले बल्कि पौधे भी तीन गुना रफ्तार से बढ़ गए।

नो कोटेड बीज को किसानों के बीच ले जाने का काम भी शुरू

30 फीसद कम पानी लेते हुए उत्पादन में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। जीवाणुओं के समूह का खेतों में प्रभाव का प्रमाणीकरण एनएबीएल (नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज) से हो चुका है। शोध के दूसरे चरण में इन जीवाणुओं को कम से कम जगह में बैठाने के लिए 20 नैनो मीटर के पाॢटकल बनाए गए। नैनोपाॢटकल को जैविक तकनीक से बनाने, उसके विभिन्न लक्षणों, चरित्र के अध्ययन और वर्णन का काम इसमें पूरा किया गया है। इसका एसईएम (स्कैनिंग इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोपी) और एक्सरे डिफ्रैक्शन प्रयोग सफलतापूर्वक पूरा हो गया है। तीसरे और अंतिम चरण में बीज पर जीवाणु कोटिंग का काम चल रहा है, जो 30-45 दिन में हो जाएगा।

ऐसे होगा इस बीज का प्रयोग

बीज के मिट्टी में जाते ही बनने लगेगी खाद इंजीनियर अक्षय बताते हैं कि इस बीज को पानी में भिगोकर खेत में डालना होगा। बीज जैसे ही मिट्टी में पहुंचेगा, इस पर लगे जीवाणु सक्रिय हो जाएंगे और सभी तरह के पोषक तत्व स्वत: ही बनने शुरू हो जाएंगे। बीज पर मौजूद सुपर अब्जारबेंट पालीमर अपने वजन से 300 गुना ज्यादा पानी सोख सकता है। ऐसे में बीज को जब भिगोया जाएगा तो वह पानी सोख लेगा और मिट्टी में जाने के बाद

धीरे-धीरे पौधे की जड़ को पानी देता रहेगा।

साधारण बीज के मुकाबले मामूली महंगा होगा

शोध में अक्षय के साथ काम कर रहे मनोज तिवारी, मुकेश चौहान ने जहां इस बीज को किसानों के बीच ले जाने का काम शुरू कर दिया है, वहीं डा. नेहा श्रीवास्तव जीवाणु के नए ग्रुप बनाने पर काम कर रही हैं। एक हेक्टेयर खेत में सामान्य जितना ही बीज का इस्तेमाल होगा। बीज का मूल्य कितना होगा यह अभी भले तय नहीं है, लेकिन अक्षय का मानना है कि साधारण बीज के मुकाबले इसकी कीमत पांच से दस फीसद अधिक हो सकती है।


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