आखिरकार तपकर सोना बन ही गए रिषभ पंत, बहुत झेलनी पड़ी थी आलोचना

आखिरकार तपकर सोना बन ही गए रिषभ पंत, बहुत झेलनी पड़ी थी आलोचना

सिडनी टेस्ट के पांचवें दिन से एक दिन पहले की बात है, रिषभ पंत की कोहनी में चोट थी और परिस्थिति कुछ ऐसी थी कि उन्हें मैच के पांचवें दिन मैदान पर उतरना था। तब पंत थ्रोडाउन स्पेशलिस्ट के साथ घंटों तक अभ्यास कर रहे थे। थ्रोडाउन कर रहे नुवान पूरी गति से बाउंसर नहीं फेंक रहे थे। पंत ने कहा पूरी गति से डालो, मैदान पर ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज ऐसी धीमी गेंद नहीं फेंकेंगे। नुवान को लग रहा था कि कहीं पंत को चोट नहीं लग जाए, लेकिन पंत लगातार कहते दिखे, और तेज डालो, और तेज डालो। पंत उस मैच में 97 रन बनाकर आउट हुए थे और उस टेस्ट को जिताने से कुछ दूर रह गए थे, लेकिन मंगलवार को वह पहली बार कोई टेस्ट मैच जिताकर नाबाद लौटे। इस आठ दिन के अंदर नादान रिषभ, नायाब पंत बन गया।

सिडनी में 97 रन पर आउट होने के बाद जब पंत ने अपने कोच तारक सिन्हा को फोन किया, तो वह काफी निराश थे। सिन्हा ने कहा कि कभी-कभी तुम्हें खराब गेंदों को छोड़ना भी होगा। पंत का जवाब था मैं खराब गेंदों को छोड़ नहीं सकता। दरअसल, अपने करियर के शुरुआती दिनों से पंत ऐसे ही हैं। उनके अंदर युवराज सिंह जैसे छक्के लगाने की क्षमता के साथ फौलादी इरादे भी हैं। अपने तेज तर्रार शॉट की वजह से ही वह राहुल द्रविड़ के पसंदीदा बने थे और इन्हीं शॉट चयन की वजह से पंत का करियर डूबता जा रहा था। वर्ष 2020 आते-आते वह अपने पसंदीदा प्रारूप (टी-20) से बाहर हो गए थे। वनडे टीम से भी निकाले गए और टेस्ट टीम में भी पहली पसंद नहीं रहे।


पंत की मदद इस मामले में कोई दूसरा नहीं कर सकता था। पंत की लड़ाई खुद से थी। यह लड़ाई इतनी आसान भी नहीं रही, क्योंकि वीरेंद्र सहवाग भी अपने शॉट चयन की वजह से विकेट खो बैठते थे और आलोचना झेलते थे, लेकिन पंत के साथ यह बार-बार होने लगा। कई बड़े मौकों पर होने लगा। पंत भी आम से खास बनने का सपना देखते आए, लेकिन उनके सपने भी बड़े थे। वह एमएस धौनी की तरह विजयी बाउंड्री लगाकर बड़ा मैच जिताना चाहते थे। ऑस्ट्रेलिया में अभ्यास मैच में बड़ी पारी खेलने के बावजूद पहले टेस्ट में पहली पसंद रिद्धिमान साहा बने।


दिल्ली की सर्दियों में गुरुद्वारे में रात बिताकर टेस्ट कैप हासिल करने वाले पंत अंदर से टूटने वालों में से कहां थे। सिडनी टेस्ट और गाबा टेस्ट में पंत के शॉट लगाने के तरीकों में पहले से कुछ भी अलग नहीं था, अलग था तो उनके अंदर का संकल्प।

2016 में उनके साथ अंडर-19 विश्व कप खेलने वाले तेज गेंदबाज शुभम मावी ने बताया कि वह क्लीन हिटर रहे हैं। कभी भी कितना भी दबाव हो वह अपना ही खेल खेलता था। घरेलू स्तर पर वह तीन बार फेल हुआ तो अगले मैच में उसकी बड़ी पारी सब भुला देती थी। राहुल द्रविड़ सर को भी उसकी यही खासियत पसंद थी लेकिन भारतीय टीम के साथ खेलते हुए उसकी समस्या यही थी कि उसके प्राकृतिक खेल की ही आलोचना होने लगी, जिसे वह बदल नहीं सकता, लेकिन मंगलवार को उसने अपनी इसी काबिलियत से अपने अंदर के पंत को हरा दिया।

रिषभ पंत के कोच तारक सिन्हा ने कहा है, "पंत ने अब अपने सभी आलोचकों को शांत कर दिया। टीम ने उसे मौका देकर दिखाया कि वह उस पर पूरा विश्वास करती है। मुझे पूरा विश्वास है कि उसकी विकेटकीपिंग भी बेहतर होगी। जब आप अपनी जगह को लेकर संतुष्ट हो जाओ और सभी कहें कि आप अच्छे हो तो बाकी चीजें खुद ठीक होने लगती हैं।"


इस खेल से बनी पहचान, भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा

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कद 5 फुट 3 इंच, लेकिन उनका हौसला और उनकी उपलब्धियां उनके कद से कई ज्यादा उपर रही। किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि ये छोटी कद वाली महिला कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर वेटलिफ्टिंग के लिए एक बड़ी नाम बन जाएगी। इतना ही नहीं, किसी ने ये तक नहीं सोचा होगा कि 5 फुट 3 इंच की इस महिला को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जाएगा। जी हां, हम बात कर रहे वेटलिफ्टर कुंजारानी देवी की, जिन्होंने 38 साल की उम्र में कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतकर भारतीय महिलाओं के लिए एक मिशाल बनीं। बता दें कि कुंजारानी का आज जन्मदिन है। इस शानदार मौके पर हम आज उनके अनछूए पलों के बारे में बात करेंगे, तो चलिए जानते है उनके बारे में कुछ अनसुनी कहानियां…

मणिपुर की हैं कुंजारानी
वेटलिफ्टर कुंजारानी का जन्म 1 मार्च 1968 में मणिपुर के कैरंग मायाई लेकाई में हुआ था। उन्होंने इम्फाल के सिंदम सिंशांग आवासीय हाई स्कूल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की, वहीं इम्फाल के महाराजा बोध चन्द्र कॉलेज से उन्होंने स्नातक तक की शिक्षा पूरी की। उन्होंने शैक्षिणिक जीवन में ही यह लक्ष्य बना लिया था कि उन्हें वेटलिफ्टिंग करना है। हालांकि इस बीच उन्होंने कई खेलों में भी हिस्सा लिया।

कैसे खेल से प्रेरित हुई कुंजारानी

कुंजारानी खेल में एंट्री कैसे ली, इसकी भी कहानी का दिलचस्प है। कुंजारानी जब 14 साल की थी, तब उन्होंने 1982 के एशियन गेम्स के बारे में सुना। उस दौरान भारतीय ट्रैक क्वीन पीटी ऊषा लोगों के जुबान पर छाई हुई थी। उनकी कामयाबी को देख कुंजारानी काफी प्रेरित हुई थी। एक चैनल के इंटरव्यू में उन्होंने इसके बारे में चर्चा करते हुए बताया था, “उस इवेंट ने मुझे ऐसा महसूस कराया कि मैं भी खेल में शानदार प्रदर्शन कर सकती हूं। उसके बाद मैंने बहुत सारे खेल खेलना शुरू कर दिए, फिर चाहे वह हॉकी हो, फुटबॉल हो या ट्रैक पर दौड़ना हो।” ये वहीं दौर था, जब कुंजारानी खेल की ओर आकर्षित हुई।

पावरलिफ्टिंग से की शुरूआत
खेल जगत का चुनाव करने के बाद कुंजारानी पावरलिफ्टिंग से अपनी करियर की शुरूआत की। इस खेल में उन्होंने अपनी प्रतिभा का कला दिखाते हुए चंद महीनों में ही राष्ट्रीय पावरलिफ्टिंग का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। लेकिन उनकी आंखों ने तो कुछ और ही सपना बुन रखा था। बता दें कि कुंजारानी ने ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेना चाहती थी। यही वजह थी कि उन्होंने पावरलिफ्टिंग का भी खेल छोड़ दिया।

वेटलिफ्टिंग में ली एंट्री
ओलंपिक का सपना देखते हुए कुंजारानी ने पावरलिफ्टिंग छोड़ वेटलिफ्टिंग में एंट्री ली। एक इंटरव्यू में कुंजारानी वेटलिफ्टिंग के बारे में बताया, “मैं साफतौर पर देख सकती थी कि जो भार मैं उठा पा रही थी उससे विश्व रिकॉर्ड बहुत दूर नहीं था। मेरे कोच हमेशा मुझे कहते थे कि अगर मैं कड़ी मेहनत करती रही तो भारत का प्रतिनिधित्व करने का मेरा सपना जल्द ही साकार होगा।”

वर्ल्ड चैंपियनशिप
वर्ष          खेल आयोजन     किलोग्राम        वर्ग पदक

1989        मैनचेस्टर               44                रजत

1991       डोनॉशेचिंगन           44                रजत

1992          वर्ना                     44                रजत

1994       इस्तांबुल                 46                रजत

1995        वारसॉ                    46                रजत

1996       गुआंगज़ौ                46                 रजत

1997       चियांग माई             46                 रजत

ये वो गेम्स है जिनमें कुंजारानी वर्ल्ड चैंपियनशिप रही है, लेकिन कभी स्वर्ण पदक तक नहीं पहुंच पाई। फिर उन्होंने ने 1990 के बीजिंग और 1994 के हिरोशिमा एशियाई गेम्स में कास्य पदक ही प्राप्त कर पाई। लंबे समय के बाद साल 2004 में एथेंस ओलंपिक गेम्स में चौथे पायदान तक ही सीमित रही। फिर साल 2006 में कमबैक करते हुए कुंजारानी ने मेलबर्न कॉमनवेल्‍थ में हिस्सा लेते हुए देश को पहला स्वर्ण पदक दिलाया।

पद्मश्री ने नवाजा गया
खेल जगत में कुंजारानी ने अपने 17 साल बिताए। इस दौरान उन्होंने कई उपलब्धियां भी हासिल की। साल 1990 में कुंजारानी को अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया। वहीं 1996 में भारत के सबसे बड़े खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न को व्यावसायिक टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस के साथ साझा करते हुए सम्मानित किया गया। इसके अलावा 2011 में कुंजारानी को पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।


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