नक्‍सलियों के खिलाफ ऑपरेशन प्रहार पार्ट-3 की तैयारी, जानें क्‍या है केंद्र और राज्‍य सरकार की रणनीति

नक्‍सलियों के खिलाफ ऑपरेशन प्रहार पार्ट-3 की तैयारी, जानें क्‍या है केंद्र और राज्‍य सरकार की रणनीति

छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिला बस्तर में नक्सलियों के खात्मे के लिए ऑपरेशन प्रहार पार्ट-3 शुरू करने की तैयारी की जा रही है। केंद्र और राज्य सरकार के इस संयुक्त आपरेशन में पुलिस और अर्धसैनिक बलों के अधिकारियों के बीच सामंजस्य बिठाकर नक्सलियों को उनके आधार इलाके में घेराबंदी करने की योजना है। बस्तर में ऑपरेशन ग्रीन हंट और ऑपरेशन हाका के तहत नक्सलियों को बैकफुट में धकेलने के बाद ऑपरेशन प्रहार शुरू किया गया है।

यह है योजना 

ऑपरेशन प्रहार वन और प्रहार टू में सुरक्षाबलों को काफी कामयाबी मिली है। बीजापुर की घटना के बाद प्रहार-3 के तहत नक्सलियों के इलाके में जाकर उन्हें नेस्तनाबूद करने की योजना है। पुलिस अधिकारियों की मानें तो नक्सलियों के टॉप लीडरों को घेरने के लिए जंगल में फोर्स को सीधे उतारने का ब्लू प्रिंट तैयार किया जा रहा है।


खुफिया इनपुट के आधार पर बड़े ऑपरेशन की तैयारी 

आधिकारिक सूत्रों की मानें तो खुफिया इनपुट के आधार पर बड़े ऑपरेशन करने की तैयारी की जा रही है। ऑपरेशन ग्रीन हंट, ऑपरेशन हाका और ऑपरेशन प्रहार की चोट से निकलने के लिए नक्सली ग्रामीणों को कवच बनाकर सुरक्षाबलों पर हमला कर रहे हैं।

लोगों को देते हैं धमकियां 

नक्सली पर्चे और बैनर पोस्टर के माध्यम से लोगों को फोर्स के खिलाफ करते हैं। बीजापुर की घटना के बाद नक्सलियों ने ताजा पर्चा जारी कर लोगों से अपील की है कि वह ऑपरेशन प्रहार से दूर रहें।


यह है बौखलाहट की वजह

सरकार ने बस्तर को नक्सल मुक्त करने के लिए बस्तर बटालियन का गठन कर इसमें स्‍थानीय लड़ाकों को शामिल किया है। आत्मसमर्पण करने के बाद फोर्स का हिस्सा बने पूर्व नक्सलियों से नक्सलियों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसी वजह से नक्सली आत्मसमर्पण नीति का विरोध कर रहे हैं। नक्सलियों की बौखलाहट की असल वजह उनके कोर इलाकों में नए कैंपों की स्थापना है।

110 गांवों में स्थापित किए गए कैंप 

बस्तर के 110 गांवों में कैंप स्थापित किए गए हैं जिससे नक्सलियों की दहशत कम हुई है। ऑपरेशन प्रहार के दौरान बीते चार साल में फोर्स के जवानों ने 286 नक्सलियों को ढेर किया है। वहीं नक्सल उन्मूलन अभियान के तहत चार साल के दौरान करीब तीन हजार नक्सलियों की गिरफ्तारी की गई है। 15 सौ नक्सली समर्पण भी कर चुके हैं।

एंटी नक्सल ऑपरेशन होगा तेज 


नारायणपुर जिले के एसपी मोहित गर्ग ने बताया कि एंटी नक्सल ऑपरेशन तेज किया जा रहा है। नक्सलियों के खात्मे के लिए जवान पूरी मुस्तैदी के साथ सर्च अभियान में निकल रहे हैं। वहीं सुकमा एसपी केएल ध्रुव ने बताया कि नक्सलियों घेराबंदी के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। कोई भी आपरेशन बिना व्यापक रणनीति के नहीं चल सकता है। 

नक्सलियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन 

सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के खिलाफ समय-समय पर कई ऑपरेशन चलाए हैं। इसकी शुरआत साल 2005 में सलवा जुड़ूम अभियान से शुरू की गई थी। यह अभियान तो जनता ने शुरू किया था लेकिन ग्रामीणों के विरोध की वजह से सुरक्षा बलों को नक्सलवाद के खिलाफ काफी सफलता मिली। साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुड़ूम पर बैन लगा दिया। हालांकि इसके पहले ही फोर्स का बेस ग्रामीणों के बीच बन चुका था। 


ऑपरेशन ग्रीन हंट भी रहा था सफल 

साल 2009 में पुलिस ने बस्तर में ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू किया था। ग्रीन हंट के तहत सूचनातंत्र को मजबूत कर के नक्सल प्रभावित इलाकों में दबिश देने की रणनीति तय की गई थी। यह अभियान भी काफी सफल रहा थी। नक्सलवाद सड़कों से सिमटकर जंगल में छिप गया। नक्सली गाहे बगाहे हमला तो करते रहे लेकिन बड़े हमलों की उनकी हिम्‍मत जाती रही। ऑपरेशन ग्रीन हंट के बाद अलग अलग कई अभियान चलाए गए थे।


पृथ्वी पर गिरती अंतरिक्ष की धूल, अंतरिक्ष चट्टानों ने निभाई जीवन के विकास में अहम भूमिका

पृथ्वी पर गिरती अंतरिक्ष की धूल, अंतरिक्ष चट्टानों ने निभाई जीवन के विकास में अहम भूमिका

हर साल करीब पांच हजार टन ब्रह्मांडीय धूल पृथ्वी पर गिरती है। इसमें मुख्यत: उल्कापिंडों और क्षुद्रग्रहों के बारीक कण होते हैं। एक नए अध्ययन के अनुसार इस धूल की मात्र पृथ्वी पर गिरने वाली अंतरिक्ष की चट्टानों की तुलना में बहुत ज्यादा होती है। पृथ्वी पर हर साल करीब दस टन बड़ी चट्टानें गिरती हैं। अंतरिक्ष की धूल की भारी मात्र के बावजूद इसे खोज पाना मुश्किल होता है। बारिश की वजह से यह धूल बह जाती है और कई स्थानों पर पृथ्वी की अपनी धूल इस धूल को ढक देती है, लेकिन अंटार्कटिका में शोधकर्ताओं ने अंतरिक्ष की धूल को एकत्र करने का तरीका विकसित कर लिया है। 

फ्रांस के राष्ट्रीय विज्ञान अनुसंधान केंद्र के भौतिकविद ज्यां दुप्रो और उनके सहयोगियों ने इस इलाके से अंतरिक्ष धूल एकत्र करने के लिए 20 वर्षो में छह अभियान आयोजित किए हैं। इस इलाके में अंतरिक्ष की धूल की परतें पूरी तरह से सुरक्षित हैं। इन परतों के आधार पर यह अनुमान लगा सकते हैं कि हर साल अंतरिक्ष से कितनी धूल पृथ्वी पर गिरती है। शोधकर्ताओं ने इस इलाके में खाइयां खोदकर 20 किलो के बैरल में बर्फ की परतों को जमा किया। बैरल को रिसर्च स्टेशन की प्रयोगशाला में सावधानीपूर्वक बर्फ की परतों को पिघलाया। बर्फ के पिघलने के बाद बची धूल के कणों को अलग कर शोधकर्ताओं ने सुनिश्चित किया कि इन नमूनों में उनके अपने दस्तानों से किसी तरह की दूसरी मिलावट न होने पाए।


मध्य अंटार्कटिका में एकत्र किए गए बर्फ के नमूनों के विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि करीब 5,200 टन अंतरिक्ष की धूल हर साल पृथ्वी पर गिरती है। इन धूल कणों का व्यास 30 से लेकर 200 माइक्रोमीटर के बीच होता है। इस प्रकार ये सूक्ष्म कण पृथ्वी पर पारलौकिक पदार्थ के सबसे बड़े स्नोत हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रविष्ट करने वाली अधिकांश अंतरिक्ष शिलाएं जल जाती हैं। इससे पृथ्वी पर गिरने वाली धूल की मात्र कम हो जाती है। हर साल करीब 15,000 टन धूल वायुमंडल में दाखिल होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि करीब एक-तिहाई हिस्सा ही पृथ्वी पर पहुंच पाता है।


शोधकर्ताओं का कहना है कि 80 प्रतिशत धूल संभवत: कुछ खास धूमकेतुओं से आती है। छोटी कक्षा वाले ये धूमकेतु बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से नियंत्रित होते हैं। करीब 20 प्रतिशत धूल संभवत: क्षुद्रग्रहों से आती है। पृथ्वी पर गिरने वाले पारलौकिक पदार्थो का अध्ययन खगोल-भौतिकी और भू-भौतिकी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पृथ्वी पर इस समय मौजूद कई तत्व संभवत: अंतरिक्ष की चट्टानों द्वारा लाए गए थे। कुछ सिद्धांतों के अनुसार अंतरिक्ष की चट्टानों के जरिये आने वाले तत्वों और मॉलिक्यूल्स ने पृथ्वी पर जीवन के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 


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