टूटा 15 सालों का रिकॉर्ड, राजधानी में लोगों का हाल-बेहाल

टूटा 15 सालों का रिकॉर्ड, राजधानी में लोगों का हाल-बेहाल

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में फरवरी माह में ही गर्मी के बढ़ते तापमान ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। बुधवार को राजधानी दिल्ली में बीते 15 सालों में फरवरी का सबसे गर्म दिन रहा। जिसके चलते सफदरजंग बेस स्‍टेशन स्‍टेशन पर 32.5 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज हुआ, जो सामान्‍य से सात डिग्री ज्‍यादा दर्ज किया गया है। इसके साथ ही नजफगढ़ और पीतमपुरा में तो पारा 33.3 डिग्री तक पहुंच गया, जबकि स्‍पोर्ट्स कॉम्‍प्‍लेक्‍स में अध‍िकतम तापमान 33.9 डिग्री रहा।

एकदम से बढ़ी गर्मी ने राजधानी दिल्ली में जबरदस्त तरीके से एंट्री मारी है। बीते छह महीने में मौसम ने इस तरह से बदलाव दिखाए हैं कि चेन्‍नई की पिच भी शरम के मारे छिप जाए। बीते साल सितंबर का महीना सबसे गर्म साबित हुआ, तो अगले तीन महीनों में तापमान न्‍यूनतम औसम से भी नीचे रहा।

वहीं जनवरी के आखिरी 13 दिनों में खूब शीतलहर पड़ी और साथ ही बदलते मौसम ने रेकॉर्ड टूट दिए, तो फरवरी सामान्‍य से ज्‍यादा गर्म साबित हो रही है। इस पर मौसम विभाग के अनुसार, पिछला सितंबर करीब दो दशकों में सबसे गर्म साबित हुआ। औसत अधिकतम तापमान 36.2 डिग्री रहा। अक्‍टूबर में ठीक इसका उलटा देखने को मिला जब 58 सालों का रेकॉर्ड टूटा।

15 साल में सबसे ठंडा
उस महीने औसत न्‍यूनतम तापमान केवल 17.2 डिग्री दर्ज हुआ। नवंबर में उससे भी पुराना रेकॉर्ड धराशायी हो गया। औसत न्‍यूनतम तापमान 10.2 डिग्री रहा जो कि 1949 के बाद सबसे कम था। दिसंबर का महीना पिछले 15 साल में सबसे ठंडा साबित हुआ।

वैसे जनवरी में भी ठंड जारी रही। बीते महीने शीतलहर वाले 7 दिन दर्ज किए गए जो 2008 के बाद सबसे ज्‍यादा रहे। फरवरी में फिर मौसम गर्मी में चरम पर पहुंच रहा है।

IMD प्रमुख कुलदीप श्रीवास्‍तव के अनुसार, अक्‍टूबर, नवंबर और दिसंबर में आमतौर पर तीन से चार पश्चिमी विक्षोभ देखने को मिलते हैं, जनवरी और फरवरी में 5 से 6 बार पश्चिमी विक्षोभ आता है। इस हिसाब से “पश्चिमी विक्षोभ की कमी प्रमुख वजह है। जनवरी में पश्चिमी विक्षोभ केवल एक बार आया और फरवरी में भी अबतक एक ही। अक्‍टूबर, नवंबर और दिसंबर में भी कम ही रहे।”


पृथ्वी पर गिरती अंतरिक्ष की धूल, अंतरिक्ष चट्टानों ने निभाई जीवन के विकास में अहम भूमिका

पृथ्वी पर गिरती अंतरिक्ष की धूल, अंतरिक्ष चट्टानों ने निभाई जीवन के विकास में अहम भूमिका

हर साल करीब पांच हजार टन ब्रह्मांडीय धूल पृथ्वी पर गिरती है। इसमें मुख्यत: उल्कापिंडों और क्षुद्रग्रहों के बारीक कण होते हैं। एक नए अध्ययन के अनुसार इस धूल की मात्र पृथ्वी पर गिरने वाली अंतरिक्ष की चट्टानों की तुलना में बहुत ज्यादा होती है। पृथ्वी पर हर साल करीब दस टन बड़ी चट्टानें गिरती हैं। अंतरिक्ष की धूल की भारी मात्र के बावजूद इसे खोज पाना मुश्किल होता है। बारिश की वजह से यह धूल बह जाती है और कई स्थानों पर पृथ्वी की अपनी धूल इस धूल को ढक देती है, लेकिन अंटार्कटिका में शोधकर्ताओं ने अंतरिक्ष की धूल को एकत्र करने का तरीका विकसित कर लिया है। 

फ्रांस के राष्ट्रीय विज्ञान अनुसंधान केंद्र के भौतिकविद ज्यां दुप्रो और उनके सहयोगियों ने इस इलाके से अंतरिक्ष धूल एकत्र करने के लिए 20 वर्षो में छह अभियान आयोजित किए हैं। इस इलाके में अंतरिक्ष की धूल की परतें पूरी तरह से सुरक्षित हैं। इन परतों के आधार पर यह अनुमान लगा सकते हैं कि हर साल अंतरिक्ष से कितनी धूल पृथ्वी पर गिरती है। शोधकर्ताओं ने इस इलाके में खाइयां खोदकर 20 किलो के बैरल में बर्फ की परतों को जमा किया। बैरल को रिसर्च स्टेशन की प्रयोगशाला में सावधानीपूर्वक बर्फ की परतों को पिघलाया। बर्फ के पिघलने के बाद बची धूल के कणों को अलग कर शोधकर्ताओं ने सुनिश्चित किया कि इन नमूनों में उनके अपने दस्तानों से किसी तरह की दूसरी मिलावट न होने पाए।


मध्य अंटार्कटिका में एकत्र किए गए बर्फ के नमूनों के विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि करीब 5,200 टन अंतरिक्ष की धूल हर साल पृथ्वी पर गिरती है। इन धूल कणों का व्यास 30 से लेकर 200 माइक्रोमीटर के बीच होता है। इस प्रकार ये सूक्ष्म कण पृथ्वी पर पारलौकिक पदार्थ के सबसे बड़े स्नोत हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रविष्ट करने वाली अधिकांश अंतरिक्ष शिलाएं जल जाती हैं। इससे पृथ्वी पर गिरने वाली धूल की मात्र कम हो जाती है। हर साल करीब 15,000 टन धूल वायुमंडल में दाखिल होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि करीब एक-तिहाई हिस्सा ही पृथ्वी पर पहुंच पाता है।


शोधकर्ताओं का कहना है कि 80 प्रतिशत धूल संभवत: कुछ खास धूमकेतुओं से आती है। छोटी कक्षा वाले ये धूमकेतु बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से नियंत्रित होते हैं। करीब 20 प्रतिशत धूल संभवत: क्षुद्रग्रहों से आती है। पृथ्वी पर गिरने वाले पारलौकिक पदार्थो का अध्ययन खगोल-भौतिकी और भू-भौतिकी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पृथ्वी पर इस समय मौजूद कई तत्व संभवत: अंतरिक्ष की चट्टानों द्वारा लाए गए थे। कुछ सिद्धांतों के अनुसार अंतरिक्ष की चट्टानों के जरिये आने वाले तत्वों और मॉलिक्यूल्स ने पृथ्वी पर जीवन के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 


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