वास्तु के अनुसार कैसा हो आपका किचन? यहां जानें इसके बारे में

वास्तु के अनुसार कैसा हो आपका किचन? यहां जानें इसके बारे में

किचन को वास्तु के अनुसार बनाना जरूरी है। कहावत है कि अच्छा खाओ और अच्छा खिलाओ। इंसान का पेट भरा हो, तो उसके दुख आधे हो जाते हैं। अगर किचन को वास्तु के अनुसार नहीं बनाया गया, तो घर में रहने वाले लोगों की सेहत, खासतौर पर महिलाओं की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा रोग, शोक और धन की बर्बादी का भी कारण बन सकता है। वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार जानें आपके किचन का सही स्वरूप क्या होना चाहिए।

किचन में किस दिशा में क्या रखें

वास्तुशास्त्र के अनुसार आपके घर का किचन आग्नेय कोण में होना फलदायी होता है। आग्नेय कोण आपके घर की दक्षिण-पूर्व की दिशा होती है। इस अनुरूप किचन में पीने का पानी उत्तर-पूर्व दिशा में रखना चाहिए। पानी और आग को कभी पास-पास नहीं रखना चाहिए। गैस दक्षिण-पूर्व दिशा में होनी चाहिए। भोजन करते समय आपका मुख उत्तर-पूर्व दिशा में और डाइनिंग टेबल दक्षिण-पूर्व में होनी चाहिए। माइक्रोवेव, मिक्सर या अन्य धातु उपकरण दक्षिण-पूर्व में तथा फ्रिज उत्तर-पश्चिम में रख सकते हैं। डस्टबिन को किचन से बाहर ही रखना चाहिए।

कैसा होना चाहिए किचन

किचन को खुला-खुला और चौकोर होना चाहिए। इसके फर्श और दीवारों का रंग पीला, नारंगी रखें और नीले रंग के प्रयोग से बचना चाहिए। पूर्व में खिड़की और उजालदान होना चाहिए। किचन में ईशान कोण की तरफ जल को रखें। रसोईघर में पूजा का स्थान और आस-पास बाथरूप या शौचालय बिल्कुल नहीं होना चाहिए। खिड़की के नीचे चूल्हा, चूल्हे के ऊपर शेल्फ तथा सिंक और चूल्हा एक ही प्लेटफार्म पर नहीं होना चाहिए। किचन में एग्जॉस्ट फैन जरूर लगाएं। वास्तु और ज्योतिष के अनुसार जहां किचन हो, भोजन वहीं करना चाहिए। इससे राहु और केतु का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है। बिना छत वाली जगह पर भोजन करने से राहु और केतु के बुरे प्रभाव सक्रिय हो जाता हैं।


बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद से बन जाते हैं सारे काम, होती है बड़ी शक्ति

बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद से बन जाते हैं सारे काम, होती है बड़ी शक्ति

अक्सर आप जब भी किसी बड़े काम के लिए निकले तो बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेकर निकलना चाहिए। अगर उनका आशीर्वाद मिल जाता है तो काम सफल हो जाता है। ऐसे में कई लोग इस बात को झूठ मानते हैं और उन्हें लगता है यह सब फ़ालतू काम है।

एक सद्गृहस्थ ऋषि के घर में बालक का जन्म हुआ. उसके ग्रह-नक्षत्रों का अध्ययन कर ऋषि ङ्क्षचतित हो उठे। ग्रह के अनुसार बालक अल्पायु होना चाहिए था। उन्होंने अपने गुरुदेव से उपाय पूछा। उन्होंने कहा, ''यदि बालक वृद्धजनों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करता रहे तो ग्रह-नक्षत्र बदलने की संभावना हो सकती है। ''एक बार संयोग से उधर सप्त ऋषि आ निकले।

उसने सप्त ऋषियों को हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया। सप्त ऋषियों ने बालक की विनम्रता से गद्गद होकर आशीर्वाद दिया 'आयुष्मान भव'-दीर्घ जीवी हो। सप्त ऋषियों ने उसे आशीर्वाद तो दे दिया पर उसी क्षण वे समझ गए कि यह ऋषि पुत्र तो अल्पायु है परंतु उन्होंने इसे दीर्घजीवी होने का आशीर्वाद दे दिया है।

अब उनका वचन असत्य निकला तो क्या होगा। अचानक ब्रह्मा जी ने उनका संशय दूर करते हुए कहा, ''वृद्धजनों का आशीर्वाद बहुत शक्तिशाली होता है। इस बालक ने असंख्य वृद्धजनों से दीर्घजीवी होने का आशीर्वाद प्राप्त कर अल्पायु होने वाले ग्रहों को बदल डाला है।