अफगानिस्‍तान में विदेश मंत्रालय के 80 फीसद कर्मचारी भागे, तालिबान का अधिकांश दूतावासों से टूटा संपर्क

अफगानिस्‍तान में विदेश मंत्रालय के 80 फीसद कर्मचारी भागे, तालिबान का अधिकांश दूतावासों से टूटा संपर्क

तालिबान की नई सरकार को बने एक माह से ज्यादा हो गया है लेकिन अन्य देशों में चल रहे अफगान दूतावासों का भविष्य अभी भी अनिश्चय की स्थिति में है। कई दूतावासों ने तालिबान की सरकार से संपर्क ही नहीं किया है फ्रांस और जर्मनी सहित कई दूतावासों ने मेजबान देशों में शरण मांगी है। कई दूतावास अभी भी पूर्व मंत्री हनीफ अतमार और पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह के संपर्क में हैं।

राजदूतों की बैठक करनी पड़ी रद

तालिबान सरकार की हालत ये है कि कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने सभी राजदूतों के साथ एक वर्चुअल बैठक का आयोजन किया, जिसे बाद में रद करना पड़ा क्योंकि अधिकांश दूतावासों से कोई जवाब ही नहीं मिला। पझवोक अफगान न्यूज के अनुसार कुछ दूतावास तो स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहे हैं, उनका राजस्व कहां से आ रहा है, इसका कोई पता नहीं है।

तालिबान सरकार की बढ़ी मुश्किलें


एक दूतावास ने तो अपना कोई हिसाब ही देने से मना कर दिया है। पांच दूतावास ऐसे हैं, जो तालिबान सरकार के मंत्रालय की किसी बात का कोई जवाब ही नहीं दे रहे हैं। कुछ ही ऐसे दूतावास हैं जिनसे तालिबान का संपर्क है। इन दूतावासों के राजदूत भी नहीं समझ पा रहे हैं कि मेजबान देश उन्हें मान्यता भी देंगे या नहीं।

विदेश मंत्रालय हुआ खाली

विदेश मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि पूरा मंत्रालय खाली हो गया है। यहां के 80 फीसद कर्मचारी नौकरी छोड़ चुके हैं और अफगानिस्तान से बाहर जा चुके हैं। आमतौर पर विदेश मंत्रालय का राजनीतिक विभाग ही दूसरे देशों में दूतावासों से संपर्क रखता है। अब यहां भी कुछ ही अधिकारी बचे हैं। ज्यादातर अफगान दूतावासों से तालिबान सरकार का संपर्क कट गया है।


मानवाधिकार परिषद के आफिस पर किया कब्जा

समाचार एजेंसी एएनआइ के अनुसार अफगानिस्तान के मानवाधिकार परिषद ने कहा है कि तालिबान उन्हें काम नहीं करने दे रहा है। तालिबान ने उनके कार्यालय पर कब्जा कर लिया है। अफगान मानवाधिकार परिषद ने एक बयान में कहा है कि तालिबान के 15 अगस्त को काबुल पर कब्जा करने के बाद भी जनता के लिए कार्य किया जा रहा था। अब तालिबान ने उनके कार्यालय पर कब्जा कर लिया है। उन्होंने यहां अपने लोग बिठा दिए हैं जो उनके कंप्यूटर और गाड़ी इस्तेमाल कर रहे हैं।


CPEC की मुश्किलों को लेकर गंभीर नहीं पाकिस्तान? चीनी निवेशकों के भागने का खतरा बढ़ा

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इस्लामाबाद
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) की पहले चरण के प्रॉजेक्ट्स पर अब भी ग्रहण के बादल लगे हुए हैं. इमरान खान सरकार अब तक चाइना की कंपनियों और निवेशकों के साथ प्रॉजेक्ट्स में आ रही अड़चनों को दूर नहीं कर पाई है. परियोजनाओं में हो रही देरी के बाद अब पूरे पर ही सवालिया निशान लगने लगा है. हाल में ही पाक चाइना रिलेशन स्टियरिंग कमेटी की मीटिंग आयोजित की गई थी. इसमें पाया गया कि पाक सरकार ने अधिकतर दिशा-निर्देशों को लागू नहीं किया है.


बिजली परियोजनाओं के लिए खड़ी हुई मुश्किलें
इस मीटिंग में पाक का अगुवाई फेडरल मिनिस्टर ऑफ प्लानिंग, डेवलपमेंट एंड स्पेशल इनिशिएटिव असद उमर ने की थी. बुधवार को हुई मीटिंग में शामिल लोगों के मुताबिक, पाक के ऊर्जा मंत्रालय ने संचालन समिति के दिए गए आदेशों को अबतक लागू नहीं किया है. अपनी पिछली मीटिंग में पाक सरकार ने 3,600 मेगावाट की उत्पादन क्षमता वाली पांच सीपीईसी बिजली परियोजनाओं के वाणिज्यिक संचालन प्रारम्भ करने में देरी से निपटने के लिए एक नीति तैयार करने के लिए पावर डिवीजन के लिए अगस्त के अंत की समय सीमा तय की थी.




अब अगली मीटिंग में होगा अंतिम फैसला
ऊर्जा मंत्रालय को इस मामले को हल करने के लिए ऊर्जा पर कैबिनेट समिति को नीति प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया था. पाकिस्तानी योजना मंत्रालय के बयान में बताया गया है कि बिजली विभाग ने समिति को सूचित किया कि छह बिजली परियोजनाओं के वाणिज्यिक संचालन की दिनांक के विस्तार का प्रस्ताव प्रक्रियाधीन हैं. अब इसे लेकर अगली मीटिंग में कोई फैसला लिया जा सकता है.




सीपीईसी बना चाइना के गले की फांस
चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर अब ड्रैगन के गले की फांस बन गया है. अरबों का पैसा लगाने के बाद भी चाइना को वह लाभ नहीं मिल रहा है जिसके लिए उसने 60 अरब US डॉलर का निवेश किया था. पाक में इसे लेकर पॉलिटिक्स भी चरम पर है. वहीं करप्शन में डूबे पाकिस्तानी नेता सड़क निर्माण काम में कोताही भी बरत रहे हैं.