दबंग और सज्जन दोनों छवि साथ जीते थे सदानंद सिंह, ताउम्र कांग्रसी रहे लेकिन...

दबंग और सज्जन दोनों छवि साथ जीते थे सदानंद सिंह, ताउम्र कांग्रसी रहे लेकिन...

दबंग और सज्जन? किसी एक व्यक्ति में इन दोनों परस्पर विरोधी प्रवृति का समावेश दुर्लभ होता है। कांग्रेस के दिग्गज रहे सदानंद सिंह (Sadanand Singh) इन दोनों प्रवृतियों को एक साथ जीते थे। वह तबीयत से लड़ते थे। उतनी ही संजीदगी से किसी के साथ अपनापन भी दिखाते थे। उनका व्यवहार सामने वाले पात्र पर निर्भर होता था। ब्रदर और भाई साहब-यह उनका प्रिय संबोधन था। वे पूरी उम्र कांग्रसी रहे, लेकिन चुनाव जीतने के लिए पार्टी पर निर्भर नहीं रहे। उन्‍होंने बिहार की कहलगांव सीट (Kahalgaon Assembly Seat) पर रिकार्ड नौ बार अपने दम पर जीत हासिल की। विधानसभा अध्‍यक्ष, मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष सहित कई महत्‍वपूर्ण पदों पर भी रहे।

संतुलित ढंग से किया विधानसभा का संचालन

सदानंद सिंह जब विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे तो तटस्थ रहे। 2000-2005 के बीच वे विधानसभा अध्यक्ष थे। राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) की सरकार कांग्रेस और वाम दलों के सहारे ढुलमुल चाल से चल रही थी। विपक्ष मजबूत था। उस कठिन दौर में उन्होंने सदन का संचालन बेहद संतुलित ढंग से किया। सदन में मारपीट की कभी नौबत नहीं आई। बहुत स्नेह से और आंखें तरेर कर भी उन्होंने पांच साल तक विधानसभा का संचालन किया। ब्रदर और भाई साहब-यह उनका प्रिय संबोधन था। अपने से कम उम्र के लोगों को भी वे ब्रदर या भाई साहब कहते

चुनाव जीतने के लिए पार्टी पर नहीं रहे निर्भर

वे जन्मजात कांग्रेसी थे, लेकिन चुनाव जीतने के लिए कभी कांग्रेस पर निर्भर नहीं रहे। 1977 में भी कहलगांव से चुनाव जीते, जब पूरे देश में और राज्य में भी कांग्रेस विरोधी लहर चल रही थी। 1985 में उन्होंने निर्दलीय चुनाव जीत कर कांग्रेस को चुनौती भी दी। मगर, दूसरे दल में नहीं गए। चुनाव जीत कर फिर कांग्रेस में लौट आए।

कांग्रेस के 2010 के कठिन दौर में दर्ज की जीत

2010 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद कठिन था। 243 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के सिर्फ पांच विधायक जीत कर आए थे। उनमें सदानंद सिंह भी थे। उम्र का हवाला देकर 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्हें चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिश की गई। उन्होंने चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की। नेतृत्व इनकार नहीं कर सका। नेतृत्व को शायद 1985 का हस्र याद आ गया हो।

कई पदों पर रहे, निभाई यादगार भूमिकाएं

विधायक, मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, विधायक दल के नेता और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उनकी भूमिकाएं यादगार रहेंगी। सभी राजनीतिक दलों से उनके रिश्ते बेहतर थे। दलीय सीमा उनकी दोस्ती में कभी बाधक नहीं बनी। कांग्रेस के बड़े नेताओं के अलावा आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ भी उनकी नजदीकी थी। तीन साल पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहलगांव की यात्रा पर थे तो उन्‍हें सदानंद सिंह ने घर आने का आमंत्रण दिया। नीतीश उनके घर गए। उन दिनों यह चर्चा भी जोरों से हुई कि सदानंद अपना राजनीतिक घर बदल देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंतत: सदानंद कांग्रेस में ही रहे। कांग्रेसी रहते हुए उन्होंने आखिरी सांस भी ली।


हल्द्वानी में अघोषित बिजली कटौती से लोग परेशान, कॉल तक रिसीव नहीं करते अधिकारी

हल्द्वानी में अघोषित बिजली कटौती से लोग परेशान, कॉल तक रिसीव नहीं करते अधिकारी

शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की समस्या आम हो चुकी है। दिन में चार से पांच घंटे तक बिजली अघोषित कटौती ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। बिजली नहीं होने पर कई छोटे व बड़े कारोबार भी प्रभावित हो रहे हैं। लोगों को गुस्सा तब आता है जब अफसरों के कॉल रिसीव तक नहीं होते।

हल्द्वानी के शहर और ग्रामीण इलाकों में पिछले दो माह से बिजली की कटौती की जा रही है। बिजली नहीं होने पर घरों में काम तो प्रभावित हो ही रहे हैं, वहीं पानी के लिए भी लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है। पानी की मोटर और नलकूप शोपिस बन रहे हैं। लोगों का कहना है कि गर्मी आने से पहले ऊर्जा निगम के अधिकारी लौपिंग चौपिंग के नाम पर घंटों रोस्टिंग करते हैं। इसके बावजूद गर्मी आने पर फिर अघोषित कटौती की जाती है। अधिकारियों को बिजली नहीं आने पर कॉल किया जाता है तो वह रिसीव नहीं किया जाता।

लोगों का कहना है कि चुनाव आने से पहले कांग्रेस, भाजपा व आम आदमी पार्टी प्रदेश को 300 यूनिट मुफ्ट बिजली देनी की बात कर रहे हैं। लेकिन अभी हो रही बिजली कटौती को लेकर कोई पार्टी सुध नहीं ले रही है। इधर, ऊर्जा निगम के अधिशासी अभियंता दीनदयाल पांगती का कहना है कि लाइन में फॉल्ट होने पर बिजली चली जाती है। बिजली को 24 घंटे सुचारू रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।